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जाँनिसार अख्तर - हर एक रूह में

 ( 2 )

हर एक रूह में

हर एक रूह में एक ग़म छुपा लगे है मुझे
ये ज़िंदगी तो कोई बद-दुआ लगे है मुझे

जो आंसुओं से कभी रात भीग जाती है
बोह'त क़रीब वह आवाज़-ए-पा लगे है मुझे

मैं जब भी उसके ख़यालों में खो सा जाता हूं
वह ख़ुद भी बात करे तो बुरा लगे है मुझे

दबा के आई है सीने में कौन सी आहें
कुछ आज रंग तेरा सांवला लगे है मुझे

न जाने वक़्त की रफ़्तार क्या दिखाती है
कभी कभी तो बड़ा ख़ौफ़ सा लगे है मुझे

बिखर गया है कुछ इस तरह आदमी का वुजूद
हर एक फ़र्द कोई सानेहा लगे है मुझे

अब एक आध क़दम का हिसाब क्या रखिए
अभी तलक तो वही फ़ासला लगे है मुझे

हिकायत-ए-ग़म-ए-दिल कुछ कशिश तो रखती है
ज़माना ग़ौर से सुनता हुआ लगे है मुझे

 - जाँनिसार अख्तर

 

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