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मैथिलीशरण गुप्त -- नहुष का पतन

       (2)  

नहुष का पतन



मत्त-सा नहुष चला बैठ ऋषियान में
व्याकुल से देव चले साथ में, विमान में


पिछड़े तो वाहक विशेषता से भार की
अरोही अधीर हुआ प्रेरणा से मार की


दिखता है मुझे तो कठिन मार्ग कटना
अगर ये बढ़ना है तो कहूँ मैं किसे हटना?

बस क्या यही है बस बैठ विधियाँ गढ़ो?
अश्व से अड़ो  ना अरे, कुछ तो बढ़ो, कुछ तो बढ़ो


बार बार कन्धे फेरने को ऋषि अटके
आतुर हो राजा ने सरौष पैर पटके


क्षिप्त पद हाय! एक ऋषि को जा लगा
सातों ऋषियों में महा क्षोभानल आ जगा


भार बहे, बातें सुने, लातें भी सहे क्या हम
तु ही कह क्रूर, मौन अब भी रहें क्या हम


पैर था या सांप यह, डस गया संग ही
पमर पतित हो तु होकर भुंजग ही


राजा हतेज हुआ शाप सुनते ही काँप
मानो डस गया हो उसे जैसे पिना साँप


श्वास टुटने-सी मुख-मुद्रा हुई विकला
"हा ! ये हुआ क्या?" यही व्यग्र वाक्य निकला


जड़-सा सचिन्त वह नीचा सर करके
पालकी का नाल डूबते का तृण धरके


शून्य-पट-चित्र धुलता हुआ सा दृष्टि से
देखा फिर उसने समक्ष शून्य दृष्टि से


दीख पड़ा उसको न जाने क्या समीप सा
चौंका एक साथ वह बुझता प्रदीप-सा -


“संकट तो संकट, परन्तु यह भय क्या ?
दूसरा सृजन नहीं मेरा एक लय क्या ?”


सँभला अद्मय मानी वह खींचकर ढीले अंग -
“कुछ नहीं स्वप्न था सो हो गया भला ही भंग.


कठिन कठोर सत्य तो भी शिरोधार्य है
शांत हो महर्षि मुझे, सांप अंगीकार्य है"


दुख में भी राजा मुसकराया पूर्व दर्प से
मानते हो तुम अपने को डसा सर्प से


होते ही परन्तु पद स्पर्श भूल चूक से
मैं भी क्या डसा नहीं गया हुँ दन्डशूक से



मानता हुँ  भूल हुई, खेद मुझे इसका
सौंपे वही कार्य, उसे धार्य हो जो जिसका



स्वर्ग से पतन, किन्तु गोत्रीणी की गोद में
और जिस जोन में जो, सो उसी में मोद में


काल गतिशील मुझे लेके नहीं बैठेगा
किन्तु उस जीवन में विष घुस पैठेगा



फिर भी खोजने का कुछ रास्ता तो उठायेगें
विष में भी  अमृत छुपा वे कृति पायेगें



मानता हूँ  भूल गया नारद का कहना
दैत्यों से बचाये भोग धाम रहना


आप घुसा असुर हाय मेरे ही ह्रदय में
मानता  हूँ आप लज्जा पाप अविनय में


मानता  हूँ  आड़ ही ली मेने स्वाधिकार की
मूल  में तो प्रेरणा थी काम के विकार की


माँगता  हूँ आज में शची से भी खुली क्षमा
विधि से बहिर्गता में भी   साध्वी वह ज्यों रमा


मानता हूँ और सब हार नहीं मानता
अपनी अगाति आज भी मैं जानता



आज मेरा भुकत्योजित हो गया है स्वर्ग भी
लेके दिखा दूँगा कल मैं ही अपवर्ग भी



तन जिसका हो मन और आत्मा मेरा है
चिन्ता नहीं बाहर उजेला या अँधेरा है



चलना मुझे है बस अंत तक चलना
गिरना ही मुख्य नहीं, मुख्य है सँभलना



गिरना क्या उसका उठा ही नहीं जो कभी
मैं ही तो उठा था आप गिरता हूँ जो अभी



फिर भी ऊठूँगा और बढ़के रहूँगा मैं
नर हूँ, पुरुष हूँ, चढ़ के  रहूँगा मैं


चाहे जहाँ मेरे उठने के लिये ठौर है
किन्तु लिया भार आज मेने कुछ और है


उठना मुझे ही नहीं बस एक मात्र रीते हाथ
मेरा देवता भी और ऊंचा उठे मेरे साथ



 -  मैथिलीशरण गुप्त

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मैथिलीशरण गुप्त -- नर हो न निराश करो मन को


(3)

नर हो न निराश करो मन को


कुछ काम करो कुछ काम करो
जग में रहके निज नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो न निराश करो मन को ।


संभलो कि सुयोग न जाए चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलम्बन को
नर हो न निराश करो मन को ।



जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को ।



निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
मरणोत्तर गुंजित गान रहे
कुछ हो न तजो निज साधन को
नर हो न निराश करो मन को ।



-  मैथिलीशरण गुप्त


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मैथिलीशरण गुप्त -- आर्य



(1)  

आर्य

हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी
आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी

भू लोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला स्थल कहां
फैला मनोहर गिरि हिमालय, और गंगाजल कहां


संपूर्ण देशों से अधिक, किस देश का उत्कर्ष है
उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है

यह पुण्य भूमि प्रसिद्घ है, इसके निवासी आर्य हैं
विद्या कला कौशल्य सबके, जो प्रथम आचार्य हैं

संतान उनकी आज यद्यपि, हम अधोगति में पड़े
पर चिन्ह उनकी उच्चता के, आज भी कुछ हैं खड़े


वे आर्य ही थे जो कभी, अपने लिये जीते न थे
वे स्वार्थ रत हो मोह की, मदिरा कभी पीते न थे

वे मंदिनी तल में, सुकृति के बीज बोते थे सदा
परदुःख देख दयालुता से, द्रवित होते थे सदा

संसार के उपकार हित, जब जन्म लेते थे सभी
निश्चेष्ट हो कर किस तरह से, बैठ सकते थे कभी

फैला यहीं से ज्ञान का, आलोक सब संसार में
जागी यहीं थी, जग रही जो ज्योति अब संसार में

वे मोह बंधन मुक्त थे, स्वच्छंद थे स्वाधीन थे
सम्पूर्ण सुख संयुक्त थे, वे शांति शिखरासीन थे


मन से, वचन से, कर्म से, वे प्रभु भजन में लीन थे
विख्यात ब्रह्मानंद नद के, वे मनोहर मीन थे



  -  मैथिलीशरण गुप्त


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